: प्रकृति की आराधना है,छठ पूजा-अंजली तोमर
बलिया। छठ महापर्व को पर्यावरण संरक्षण और प्रकृति प्रेम का सबसे बड़ा त्यौहार मानते हुए सहायक अध्यापिका अंजली तोमर ने अपने विद्यालय को डुरंटा 101पौधा प्रदान कर यह संकल्प लिया कि मैं अपने विद्यालय को स्वच्छ वातावरण से परिपूर्ण करूंगी। इसके लिए चाहे मुझे अपने वेतन से जो धन खर्च करना पड़े करुंगी। अंजली तोमर ने बताया कि जिस स्थान पर हम कार्य करते है वह अपने निवास स्थान से खूबसूरत होना चाहिए मेरी कर्मस्थली मेरे लिए देवालय है मै निरंतर इसके लिए कार्य करती रहूंगी साथ ही जब विद्यालय का वातावरण खूबसूरत होगा तो बच्चों के नामांकन और ठहराव में यह उपयोगी होगा ।
उन्होंने छठ पर्व के बारे में बताया कि छठ पूजा का सबसे महत्त्वपूर्ण पक्ष इसकी सादगी पवित्रता और लोकपक्ष है। भक्ति और आध्यात्म से परिपूर्ण इस पर्व में बाँस निर्मित सूप, टोकरी, मिट्टी के बर्त्तनों, गन्ने का, गुड़, चावल और गेहूँ से निर्मित प्रसाद और सुमधुर लोकगीतों से युक्त होकर लोक जीवन की भरपूर मिठास का प्रसार करता है।
शास्त्रों से अलग यह जन सामान्य द्वारा अपने रीति-रिवाजों के रंगों में गढ़ी गयी उपासना पद्धति है। इसके केंद्र में वेद, पुराण जैसे धर्मग्रन्थ न होकर किसान और ग्रामीण जीवन है। इस व्रत के लिए न विशेष धन की आवश्यकता है न पुरोहित या गुरु के अभ्यर्थना की। जरूरत पड़ती है तो पास-पड़ोस के सहयोग की जो अपनी सेवा के लिए सहर्ष और कृतज्ञतापूर्वक प्रस्तुत रहता है। इस उत्सव के लिए जनता स्वयं अपने सामूहिक अभियान से संगठित होती है। नगरों की सफाई, व्रतियों के गुजरने वाले रास्तों का प्रबन्धन, तालाब या नदी किनारे अर्घ्य दान की उपयुक्त व्यवस्था के लिए समाज सरकार के सहायता की राह नहीं देखता। इस उत्सव में खरना के उत्सव से लेकर अर्ध्यदान तक समाज की अनिवार्य उपस्थिति बनी रहती है। यह सामान्य और गरीब जनता के अपने दैनिक जीवन की मुश्किलों को भुलाकर सेवा-भाव और भक्ति-भाव से किये गये सामूहिक कर्म का विराट और भव्य प्रदर्शन होता है।
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